नाम: रामदयाल, पिता: प्रभु लाल

उम्र: 60 वर्ष

गाँव: पारणा

जिला: बून्दी

रामदयाल पिछले 10-12 सालों से सिलिकोसिस की बीमारी से पीड़ित है. रामदयाल पारणा में पत्थरों की ख़ान पर काम करता है. जब उसे श्वास लेने में तकलीफ़ हुई और वह बीमार पड़डॉक्टर के पास गया, तब डॉक्टर ने उसे टी. बी. बताकर टी. बी. की दवाइयाँ शुरू कर दी. लगभग 2004 से 2015 तक टी. बी. की दवाइयाँ ली पर जब आराम नहीं पड़ा तब रामदयाल ने 2015 में मेडिकल कॉलेज, कोटा, में जाँच करवाई तो पता चला की उसे सिलिकोसिस की बीमारी हुई है. जिसका कोई इलाज नहीं है.

बीमारी का पता चलने के बाद रामदयाल ने जिला कलेक्टर कार्यालय में सहयता राशि या सरकारी सहयता के लिए आवेदन किया परंतु उन्हें कोई लाभ नहीं मिला. कई बार जिला कलेक्ट्री के चक्कर भी लगाए पर कोई फ़ायदा नहीं हुआ.

निराश होकर रामदयाल आज तक उसी पत्थर की ख़ान में काम कर रहा है. अब उसकी पत्नी भी ख़ान पर काम कर उसके पति का साथ दे रही है ताकि घर का चूल्हा तो जले पर साथ में रामदयाल के इलाज के लिए भी पैसे जोड़ सके.

पत्थरों की ख़ान पर काम कर रहे अधिकतर लोगों को सिलिकोसिस नामक बीमारी हो रही है. पत्थरों को काटने पर जो धुआँ उड़ता है वो उनके फेफड़ों पर जमता जाता है. और वे मज़दूर पीने के लिए भी खानों का पानी ही इस्तेमाल करते हैं.

दो वक़्त की रोटी की लिए रामदयाल जैसे हज़ारों मज़दूर अपनी ज़िंदगी की कहानी इन पत्थरों की खानों पर पूरी कर देते हैं. इनके जाते ही इनके बीवी-बच्चें इनका काम संभाल लेते हैं, और वो भी सिलिकोसिस बीमारी का शिकार होते जाते हैं. कीमती पत्थरों को ये बड़े ध्यान से तराशते हैं पर अपनी ज़िंदगी का रूप बिगाड़ देते हैं.

इन ख़ान मज़दूरों की तरफ तो सरकार का ध्यान जाता ही नहीं है. डॉक्टर भी सही इलाज न बताकर टी. बी. की दवाई देते जाता है. ख़ान मालिक और ठेकेदार को तो अपने काम और उस पर होनेवाले फ़ायदे से मतलब होता है. मज़दूर मरे या जिए उससे उन्हें क्या? उसके बच्चे संभालेंगे आगे के काम को.

सरकार को पत्थरों की खानों पर सभी मज़दूरों की व्यवस्था, चाहे मज़दूर हो या उनके स्वास्थ्य से संबंधित हो, के लिए ख़ान मालिकों और ठेकेदारों पर डालना चाहिए. तभी रामदयाल और उसके जैसे परिवार सही ढंग से ज़िंदगी जी पाएँगे. सभी मज़दूरों की समय-समय पर डॉक्टर से जाँच होनी चाहिए. यदि कोई बीमार है तो उसे समय पर मुआवज़ा भी मिलना चाहिए.