सूचना एवं रोज़गार अधिकार अभियान द्वारा पिछले 1 दिसंबर को जयपुर से शुरू
की गयी जवाबदेही यात्रा इन दिनों श्री गंगानगर जिले में है. पिछले 82
दिनों में राज्य के 26 जिलों में घूम घूम कर सरकारी तंत्र की जवाबदेही
सुनिश्चित करने की एक पुख्ता व्यवस्था कायम करने के उद्देश्य से चल रही
इस यात्रा में न सिर्फ राज्य के विभिन्न जिलों बल्कि देश के कई हिस्सों
से लोग जुड़े हैं.

उल्लेखनीय है कि वह सूचना एवं रोज़गार अधिकार अभियान (राजस्थान के 100 से
भी अधिक जन-संगठनों का समूह) ही था जिसने देश में सूचना के अधिकार कानून,
2005 और महात्मा गाँधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोज़गार गारंटी कानून, 2006 को
पास कराने में अहम भूमिका निभाई थी. दिहाड़ी मजदूरी पर काम कर गुज़ारा करने
वाले लोग, बूढी एवं एकल महिलाएं, भूमिहीन व लघु कृषक, देश के नामचीन
कॉलेजों में पढने वाले विद्यार्थी और शिक्षा, स्वास्थय, आदिवासी एवं
दलितों के अधिकार और गरीब और वंचित वर्गों के हितों के लिए काम करने वाले
कार्यकर्ता, पत्रकार, बुद्धिजीवी, शिक्षक, वकील, फ़िल्मकार, आदि कई तरह के
लोग; कुछ ठेठ देहाती तो कुछ ऐसे जिन्होंने अपने जीवन में कभी कोई गाँव तक
नहीं देखा; ऐसे कई तरह के लोग इस यात्रा में कंधे से कंधे मिलाकर आगे बढ़
रहे हैं. इन सभी ने स्वेच्छा से समय निकालकर इस यात्रा में जुड़ने का
निर्णय लिया. मकसद साफ़ था – जनता के सेवक जो अब उनके शोषक बन गए हैं उन
पर लगाम लगाना. एक ऐसी व्यवस्था बनाना जिसमें आम लोगों की सुनवाई हो और
उनकी शिकायतों का समय पर निपटारा हो.

भगत सिंह सर्किल पर की नुक्कड़ सभा
जवाबदेही यात्रा ने आज गंगानगर के भगत सिंह सर्किल पर एक सभा की. यहाँ
हुई सभा को संबोधित करते हुए निखिल डे ने कहा कि आज सरकारी तंत्र बिलकुल
निरंकुश हो गया है. इतनी मोटी तनख्वाह लेने के बाद भी सरकारी अधिकारिओं
और कर्मचारिओं की कोई जवाबदेही नहीं है. जिस प्रकार एक मजदूर के लिए काम
निर्धारित होता है और काम नहीं करने पर उसे उसका खामियाजा भुगतना पड़ता है
उसी प्रकार इन कर्मचारिओं और अधिकारिओं के स्पष्ट जॉब चार्ट बने और काम
नहीं करने पर इनके ऊपर जुर्माना लगाया जाये ऐसा एक कानून राज्य सरकार
द्वारा बनाया जाना चाहिए. जो लोग रिश्वत मांगे उन्हें तुरंत जेल भेजा
जाना चाहिए. साथ ही उन्होंने कहा कि अब हम प्रशासन के इस ढुलमुल और
टालमटोल वाले रवैये को बर्दाश्त नहीं करेंगे.

यह एक सुखद संयोग था कि शहीद भगत सिंह के वंश से युवा नेता एवं सामाजिक
कार्यकर्ता अवितेज सिंह संधू भी यात्रा के साथ मौजूद थे. यहाँ हुई सभा को
संबोधित करते हुए उन्होंने कहा कि आज लोकतंत्र जिस तरह से खोखला होता जा
रहा है उसे बचाने में युवाओं की महती भूमिका है. उन्होंने कहा कि मात्र
महापुरुषों के बारे में बातें करने या उन्हें रोल मॉडल बना लेने से
समस्याएं नहीं सुलझेंगी युवाओं को भगत सिंह और उनके जैसे अनगिनत
महापुरुषों के विचारों को अपने जीवन में ढालना होगा.
यात्रा दल ने इस अवसर पर शहीद भगत सिंह के योगदान को याद कर उनके बताये
मार्ग पर चलने का संकल्प लिया.

सर्वेक्षण दल ने किया दौरा
आज यात्रा के सर्वेक्षण दल ने राजकीय उच्च प्राथमिक विद्यालय 500 एल एन
पी-2, राजकीय उच्च माध्यमिक विद्यालय खाट लवाना, अटल सेवा केंद्र खाट
लवाना, उप स्वास्थ केन्द्र 500 एल एन पी-2 और प्राथमिक स्वास्थ केंद्र
हिन्दूमलकोट का अवलोकन किया.

राजकीय उच्च माध्यमिक विद्यालय खाट लवाना में 4 शिक्षको की कमी है जिसमे
से दो व्याख्याता ग्रेड के शिक्षक नहीं है. यह स्कूल हाल वर्ष में ही
12वीं कक्षा तक क्रमोन्नत हुआ फिर भी शिक्षको की पूर्ति नहीं हुई. साथ ही
इस क्षेत्र में कुछ समय पहले स्कूलों में शिक्षक लगाये गए परन्तु खाट
लावना का यह स्कूल फिर भी शिक्षकों से वंचित रह गया. उप स्वास्थ केंद्र
500 एल एन पि 2 कार्य समय पर बंद पाया गया. 500 एल एन पि 2 में कोई
आंगनवाडी भी नहीं है और सबसे नजदीकी आंगनवाडी 3 कि.मी.. की दूरी पर है.

प्राथमिक स्वास्थय केंद्र हिन्दुमलकोट का इमरजेंसी नंबर 104 पिछले 4 माह
से बंद है साथ ही वैकल्पिक नंबर भी जनता की पहुँच में नहीं है. साथ ही
इमरजेंसी सुविधा के लिए अस्पताल में एक भी स्टाफ नहीं था. साथ ही अवलोकन
में पाया गया की खाट लवाना के अटल सेवा केंद्र में इन्टरनेट पिछले कई
दिनों से बंद है जिसकी वजह से अधिकतर समय पर इ- मित्र केंद्र बंद रहता
है.

अधिकारिओं से मिला प्रतिनिधि मंडल
यात्रा के एक प्रतिनिधि मंडल ने जिला कलक्टर तथा अन्य जिला स्तरीय
अधिकारिओं से एक मीटिंग की. इस प्रतिनिधि मंडल में सूचना एवं रोज़गार
अभियान के निखिल डे, शंकर सिंह, सूचना अधिकार मंच के कमल टांक तथा अभियान
के अन्य साथी शामिल थे. प्रशासन की ओर से जिला कलक्टर, जिला शिक्षा
अधिकारी, जिला रसद अधिकारी, समाज कल्याण विभाग तथा अन्य विभागों के
अधिकारी मौजूद थे.

अधिकारिओं ने दिए कई आदेश
राशन सम्बन्धी शिकायतों पर यात्रा की मांग थी कि सभी राशन दुकानों पर
खाध्य सुरक्षा लाभार्थिओं की सूची चस्पा की जाए साथ ही राशन की पात्रता
की शर्तों को भी स्पष्ट रूप से राशन दुकानों के बाहर पेंट किया जाये.
अधिकारिओं ने सरकारी आदेशानुसार इन सूचिओं को जल्द ही चस्पा करने का
आश्वासन दिया. साथ ही ई-मित्र केन्द्रों पर मुहमांगी राशी वसूले जाने की
शिकायतों पर अधिकारिओं ने कहा कि राज्य सरकार के आदेशानुसार सभी ई-मित्र
केंद्र संचालकों को निर्देश दिए जायेंगे कि वे विभिन्न सुविधाओं की
रेट-लिस्ट अपने केन्द्रों के बाहर लगायें और ये साफ़ तौर पर लिखें कि
विभिन्न सुविधाएं प्राप्त करने की निर्धारित फीस क्या है. उन्होंने यह भी
कहा कि अनियमितता पाए जाने पर इन संचालकों के खिलाफ कार्यवाही भी की
जाएगी. साथ ही अन्य मुद्दों पर भी अधिकारिओं ने शीघ्र और उचित कार्यवाही
का आश्वासन दिया.

उल्लेखनीय है कि जन सहयोग से चल रही इस यात्रा को हर जगह जनता का भरपूर
समर्थन मिल रहा है. अब तक हजारों लोग जवाबदेही कानून के समर्थन में चलाये
जा रहे हस्ताक्षर अभियान से जुड़ चुके हैं और यह संख्या लगातार बढती जा
रही है. इस अभियान से जुड़ने के लिए नागरिक 07676307090 नंबर पर मिस्ड कॉल
भी कर सकते हैं.

अधिक जानकारी के लिए संपर्क करें –
सूचना एवं रोजगार अधिकार अभियान, राजस्थान की ओर से
संपर्क – निखिल डे – 9414004180, मुकेश – 946886200
कमल – 9413457292
हरिओम – 9413831761 अमित -09873522104

फ़िरोज़ खान
मीडिया कॉडिनेटर
एच एम् आर सी बारां ।

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प्रेस विज्ञप्ति

20.02.2016

*श्रीगंगानगर को अलविदा कर बीकानेर की ओर बढ़ी जवाबदेही यात्रा*

*465 हेड में जुटाया जवाबदेही कानून के लिए समर्थन *

सूरतगढ़, श्री गंगानगर, 465 हेड, बीकानेर, राजस्थान

100-दिवसीय राज्य स्तरीय जवाबदेही यात्रा आज अपने 82वें दिन श्रीगंगानगर के
सूरतगढ़ में पहुंची और यहाँ लोगों को सरकारी तंत्र की जवाबदेही सुनिश्चित करने
के लिए एक कानून बनाने की मांग के लिए लामबंद किया.

भाटिया आश्रम में हुई सभा को संबोधित करते हुए सूचना रोज़गार अभियान के निखिल
डे ने कहा कि आखिर हम सरकार किसलिए बनाते हैं? क्यों सरकारी अधिकारिओं और
कर्मचारिओं को तनख्वाह और तमाम सुविधाएं दी जाती है इसीलिए कि आम जनता का जीवन
सुगम बने और उन्हें सम्मानपूर्वक जीवनयापन के लिए मूलभूत सुविधाएं मिलें लेकिन
आज व्यवस्था में बैठे लोग जनता का शोषण करने में लगे हुए हैं. उन्होंने कहा कि
मोटी तनख्वाहें पाने वाले सरकारी अधिकारी और कर्मचारी या फिर जनता की सेवा के
नाम पर जन-प्रतिनिधि बने लोग इन सबकी जनता के प्रति क्या जवाबदेही है ये सबसे
बड़ा सवाल है और इसी सवाल का जवाब ढूंढते हुए पिछले 82 दिनों से राजस्थान भर के
26 जिलों में जवाबदेही यात्रा घूम रही है और लोगों से जवाबदेही कानून के लिए
समर्थन ले रही है.

उल्लेखनीय है कि सूचना एवं रोज़गार अधिकार अभियान द्वारा चलाई जा रही इस यात्रा
का मुख्य उद्देश्य एक ऐसी मजबूत और जनोपयोगी जवाबदेही व्यवस्था के लिए मांग
करना है जिसमें ठीक से काम न करने वाले सरकारी कर्मचारिओं पर पेनल्टी लगने,
सरकारी योजनाओं के लाभ से वंचित हुए नागरिकों को उचित मुआवजा मिलने, और
भ्रष्टाचार के आरोपी कर्मचारिओं पर कठोर कार्यवाही किये जाने के प्रावधान हों.

*सर्वेक्षण दल ने किया राजकीय उच्च माध्यमिक विद्यालय मानकसर का दौरा*

आज यात्रा के सर्वेक्षण दल ने राजकीय उच्च माध्यमिक विद्यालय मानकसर का अवलोकन
किया. यात्रा दल के रजत ने बताया कि यह चौंकाने वाला है कि यह स्कूल आदर्श
स्कूलों की श्रेणी में है फिर भी स्कूल बहुत सारी बुनियादी समस्याओं से जूझ
रहा है. यहाँ शिक्षकों के पांच रिक्त पद है जिसमे एक पद व्याख्याता ग्रेड का
है. इस उच्च माध्यमिक विद्यालय में सिर्फ नौ ही कक्षा कक्ष हैं. अभी तक स्कूल
के पास खेल मैदान के लिए अपनी जमीन आवंटित नहीं हुई है. साथ ही स्कूल की
दीवारें भी कई जगह से क्षतिग्रस्त हैं और कभी भी गिर सकती है. बच्चे कक्षाओ
में फर्श पर बैठ कर पढने को मजबूर हैं.

यात्रा से जुड़े कमल टांक ने बताया कि यात्रा सूरतगढ़ से निकलकर बीकानेर के 465
हेड पहुंची जहाँ एक नुक्कड़ सभा कर यात्रिओं ने जवाबदेही कानून की मांग के लिए
समर्थन हासिल किया. उल्लेखनीय है कि यह यात्रा जन सहयोग से ही चलाई जा रही है.
नुक्कड़ सभाओं से प्राप्त आर्थिक सहायता से ही यात्रा अब तक एक लाख से ज्यादा
की राशी जुटा चुकी है.

मजदूर किसान शक्ति संगठन के वरिष्ठ कार्यकर्ता शंकर सिंह ने बताया कि यात्रा न
सिर्फ लोगों को विभिन्न सरकारी योजनाओं के बारे में जागृत कर रही है बल्कि
उनकी प्रशासन से सम्बंधित शिकायतों को रिकॉर्ड कर उन्हें राजस्थान संपर्क
पोर्टल पर दर्ज भी कराती जा रही है. उन्होंने यह भी बताया कि यात्रा अब तक
8,000 से भी ज्यादा शिकायतें इस तरह दर्ज कर चुकी है जिनके उचित निस्तारण के
लिए यात्रा दल ने एक हेल्पलाइन (8890406072) भी बनायीं है जिसपर शिकायत दर्ज
करने वाले लोग अपनी शिकायत पर हो रही कार्यवाही के बारे में जान सकते हैं.
उन्होंने यह भी बताया कि *इस अभियान से जुड़ने के लिए नागरिक **07676307090 **नंबर
पर मिस्ड कॉल भी कर सकते हैं*.

फोटो –

1. विद्यालय में फर्श पर बैठे विद्यार्थी
२. भाटिया आश्रम में विद्यार्थिओं को संबोधित करते निखिल डे

अधिक जानकारी के लिए संपर्क करें –

*सूचना एवं रोजगार अधिकार अभियान, राजस्थान की ओर से*

संपर्क – निखिल डे – 9414004180, मुकेश – 946886200

कमल – 9413457292

हरिओम – 9413831761 अमित -09873522104

फ़िरोज़ खान
मीडिया कॉडिनेटर
एच एम् आर सी बारां ।
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जिनमें शर्म बाकी है : ज़ी न्यूज टीवी के पत्रकार Vishwa Deepak ने इस्तीफा दे दिया है। इस्तीफे के साथ उन्होंने एक पत्र लिखा है,
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हम पत्रकार अक्सर दूसरों पर सवाल उठाते हैं लेकिन कभी खुद पर नहीं. हम दूसरों की जिम्मेदारी तय करते हैं लेकिन अपनी नहीं. हमें लोकतंत्र का चौथा खंभा कहा जाता है लेकिन क्या हम, हमारी संंस्थाएं, हमारी सोच और हमारी कार्यप्रणाली लोकतांत्रिक है ? ये सवाल सिर्फ मेरे नहीं है. हम सबके हैं.

JNUSU अध्यक्ष कन्हैया कुमार को ‘राष्ट्रवाद’ के नाम पर जिस तरह से फ्रेम किया गया और मीडिया ट्रायल करके ‘देशद्रोही’ साबित किया गया, वो बेहद खतरनाक प्रवृत्ति है. हम पत्रकारों की जिम्मेदारी सत्ता से सवाल करना है ना की सत्ता के साथ संतुलन बनाकर काम करना. पत्रकारिता के इतिहास में हमने जो कुछ भी बेहतर और सुंदर हासिल किया है, वो इन्ही सवालों का परिणाम है.

सवाल करना या न करना हर किसी का निजी मामला है लेकिन मेरा मानना है कि जो पर्सनल है वो पॉलिटिकल भी है. एक ऐसा वक्त आता है जब आपको अपनी पेशेवर जिम्मेदारियों और अपनी राजनीतिक-समाजिक पक्षधरता में से किसी एक पाले में खड़ा होना होता है. मैंने दूसरे को चुना है और अपने संस्थान ZEE NEWS से इन्ही मतभेदों के चलते 19 फरवरी को इस्तीफा दे दिया है.

मेरा इस्तीफा इस देश के लाखों-करोड़ों कन्हैयाओं और जेएनयू के उन दोस्तों को समर्पित है जो अपनी आंखों में सुंदर सपने लिए संघर्ष करते रहे हैं, कुर्बानियां देते रहे हैं.
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(ज़ी न्यूज़ के नाम मेरा पत्र जो मेेरे इस्तीफ़े में संलग्न है)

प्रिय ज़ी न्यूज़,

एक साल 4 महीने और 4 दिन बाद अब वक्त आ गया है कि मैं अब आपसे अलग हो जाऊं. हालांकि ऐसा पहले करना चाहिए था लेकिन अब भी नहीं किया तो खुद को कभी माफ़ नहीं कर सकूंगा.

आगे जो मैं कहने जा रहा हूं वो किसी भावावेश, गुस्से या खीझ का नतीज़ा नहीं है, बल्कि एक सुचिंतित बयान है. मैं पत्रकार होने से साथ-साथ उसी देश का एक नागरिक भी हूं जिसके नाम अंध ‘राष्ट्रवाद’ का ज़हर फैलाया जा रहा है और इस देश को गृहयुद्ध की तरफ धकेला जा रहा है. मेरा नागरिक दायित्व और पेशेवर जिम्मेदारी कहती है कि मैं इस ज़हर को फैलने से रोकूं. मैं जानता हूं कि मेरी कोशिश नाव के सहारे समुद्र पार करने जैसी है लेकिन फिर भी मैं शुरुआत करना चहता हूं. इसी सोच के तहत JNUSU अध्यक्ष कन्हैया कुमार के बहाने शुरू किए गए अंध राष्ट्रवादी अभियान और उसे बढ़ाने में हमारी भूमिका के विरोध में मैं अपने पद से इस्तीफा देता हूं. मैं चाहता हूं इसे बिना किसी वैयक्तिक द्वेष के स्वीकार किया जाए.

असल में बात व्यक्तिगत है भी नहीं. बात पेशेवर जिम्मेदारी की है. सामाजिक दायित्वबोध की है और आखिर में देशप्रेम की भी है. मुझे अफसोस के साथ कहना पड़ रहा है कि इन तीनों पैमानों पर एक संस्थान के तौर पर तुम तुमसे जुड़े होने के नाते एक पत्रकार के तौर पर मैं पिछले एक साल में कई बार फेल हुए.

मई 2014 के बाद से जब से श्री नरेन्द्र मोदी भारत के प्रधानमंत्री बने हैं, तब से कमोबेश देश के हर न्यूज़ रूम का सांप्रदायीकरण (Communalization) हुआ है लेकिन हमारे यहां स्थितियां और भी भयावह हैं. माफी चाहता हूं इस भारी भरकम शब्द के इस्तेमाल के लिए लेकिन इसके अलावा कोई और दूसरा शब्द नहीं है. आखिर ऐसा क्यों होता है कि ख़बरों को मोदी एंगल से जोड़कर लिखवाया जाता है ? ये सोचकर खबरें लिखवाई जाती हैं कि इससे मोदी सरकार के एजेंडे को कितना गति मिलेगी ?

हमें गहराई से संदेह होने लगा है कि हम पत्रकार हैं. ऐसा लगता है जैसे हम सरकार के प्रवक्ता हैं या सुपारी किलर हैं? मोदी हमारे देश के प्रधानमंत्री हैं, मेरे भी है; लेकिन एक पत्रकार के तौर इतनी मोदी भक्ति अब हजम नहीं हो रही है ? मेरा ज़मीर मेरे खिलाफ बग़ावत करने लगा है. ऐसा लगता है जैसे मैं बीमार पड़ गया हूं.

हर खबर के पीछे एजेंडा, हर न्यूज़ शो के पीछे मोदी सरकार को महान बताने की कोशिश, हर बहस के पीछे मोदी विरोधियों को शूट करने की का प्रयास ? अटैक, युद्ध से कमतर कोई शब्द हमें मंजूर नहीं. क्या है ये सब ? कभी ठहरकर सोचता हूं तो लगता है कि पागल हो गया हूं.

आखिर हमें इतना दीन हीन, अनैतिक और गिरा हुआ क्यों बना दिया गया ?देश के सर्वोच्च मीडिया संस्थान से पढ़ाई करने और आजतक से लेकर बीबीसी और डॉयचे वेले, जर्मनी जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों में काम करने के बाद मेरी पत्रकारीय जमापूंजी यही है कि लोग मुझे ‘छी न्यूज़ पत्रकार’ कहने लगे हैं. हमारे ईमान (Integrity) की धज्जियां उड़ चुकी हैं. इसकी जिम्मेदारी कौन लेगा ?

कितनी बातें कहूं. दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल के खिलाफ लगातार मुहिम चलाई गई और आज भी चलाई जा रही है . आखिर क्यों ? बिजली-पानी, शिक्षा और ऑड-इवेन जैसी जनता को राहत देने वाली बुनियादी नीतियों पर भी सवाल उठाए गए. केजरीवाल से असहमति का और उनकी आलोचना का पूरा हक है लेकिन केजरीवाल की सुपारी किलिंग का हक एक पत्रकार के तौर पर नहीं है. केजरीवाल के खिलाफ की गई निगेटिव स्टोरी की अगर लिस्ट बनाने लगूंगा तो कई पन्ने भर जाएंगे. मैं जानना चाहता हूं कि पत्रकारिता के बुनियादी सिद्धांत ‘तटस्थता’ का और दर्शकों के प्रति ईमानदारी का कुछ तो मूल्य है, कि नहीं ?

दलित स्कॉलर रोहित वेमुला की आत्महत्या के मुद्दे पर ऐसा ही हुआ. पहले हमने उसे दलित स्कॉलर लिखा फिर दलित छात्र लिखने लगे. चलो ठीक है लेकिन कम से कम खबर तो ढंग से लिखते.रोहित वेमुला को आत्महत्या तक धकेलने के पीछे ABVP नेता और बीजेपी के बंडारू दत्तात्रेय की भूमिका गंभीरतम सवालों के घेरे में है (सब कुछ स्पष्ट है) लेकिन एक मीडिया हाउस के तौर हमारा काम मुद्दे को कमजोर (dilute) करने और उन्हें बचाने वाले की भूमिका का निर्वहन करना था.

मुझे याद है जब असहिष्णुता के मुद्दे पर उदय प्रकाश समेत देश के सभी भाषाओं के नामचीन लेखकों ने अकादमी पुरस्कार लौटाने शुरू किए तो हमने उन्हीं पर सवाल करने शुरू कर दिए. अगर सिर्फ उदय प्रकाश की ही बात करें तो लाखों लोग उन्हें पढ़ते हैं. हम जिस भाषा को बोलते हैं, जिसमें रोजगार करते हैं उसकी शान हैं वो. उनकी रचनाओं में हमारा जीवन, हमारे स्वप्न, संघर्ष झलकते हैं लेकिन हम ये सिद्ध करने में लगे रहे कि ये सब प्रायोजित था. तकलीफ हुई थी तब भी, लेकिन बर्दाश्त कर गया था.

लेकिन कब तक करूं और क्यों ??

मुझे ठीक से नींद नहीं आ रही है. बेचैन हूं मैं. शायद ये अपराध बोध का नतीजा है. किसी शख्स की जिंदगी में जो सबसे बड़ा कलंक लग सकता है वो है – देशद्रोह. लेकिन सवाल ये है कि एक पत्रकार के तौर पर हमें क्या हक है कि किसी को देशद्रोही की डिग्री बांटने का ? ये काम तो न्यायालय का है न ?

कन्हैया समेत जेएनयू के कई छात्रों को हमने ने लोगों की नजर में ‘देशद्रोही’ बना दिया. अगर कल को इनमें से किसी की हत्या हो जाती है तो इसकी जिम्मेदारी कौन लेगा ? हमने सिर्फ किसी की हत्या और कुछ परिवारों को बरबाद करने की स्थिति पैदा नहीं की है बल्कि दंगा फैलाने और गृहयुद्ध की नौबत तैयार कर दी है. कौन सा देशप्रेम है ये ? आखिर कौन सी पत्रकारिता है ये ?

क्या हम बीजेपी या आरएसएस के मुखपत्र हैं कि वो जो बोलेंगे वहीं कहेंगे ? जिस वीडियो में ‘पाकिस्तान जिंदाबाद’ का नारा था ही नहीं उसे हमने बार-बार हमने उन्माद फैलाने के लिए चलाया. अंधेरे में आ रही कुछ आवाज़ों को हमने कैसे मान लिया की ये कन्हैया या उसके साथियों की ही है? ‘भारतीय कोर्ट ज़िंदाबाद’ को पूर्वाग्रहों के चलते ‘पाकिस्तान जिंदाबाद’ सुन लिया और सरकार की लाइन पर काम करते हुए कुछ लोगों का करियर, उनकी उम्मीदें और परिवार को तबाही की कगार तक पहुंचा दिया. अच्छा होता कि हम एजेंसीज को जांच करने देते और उनके नतीजों का इंतज़ार करते.

लोग उमर खालिद की बहन को रेप करने और उस पर एसिड अटैक की धमकी दे रहे हैं. उसे गद्दार की बहन कह रहे हैं. सोचिए ज़रा अगर ऐसा हुआ तो क्या इसकी जिम्मेदारी हमारी नहीं होगी ? कन्हैया ने एक बार नहीं हज़ार बार कहा कि वो देश विरोधी नारों का समर्थन नहीं करता लेकिन उसकी एक नहीं सुनी गई, क्योंकि हमने जो उम्माद फैलाया था वो NDA सरकार की लाइन पर था. क्या हमने कन्हैया के घर को ध्यान से देखा है ? कन्हैया का घर, ‘घर’ नहीं इस देश के किसानों और आम आदमी की विवशता का दर्दनाक प्रतीक है. उन उम्मीदों का कब्रिस्तान है जो इस देश में हर पल दफ्न हो रही हैं. लेकिन हम अंधे हो चुके हैं !

मुझे तकलीफ हो रही है इस बारे में बात करते हुए लेकिन मैं बताना चाहता हूं कि मेरे इलाके में भी बहुत से घर ऐसे हैं. भारत का ग्रामीण जीवन इतना ही बदरंग है.उन टूटी हुई दीवारों और पहले से ही कमजोर हो चुकी जिंदगियों में हमने राष्ट्रवादी ज़हर का इंजेक्शन लगाया है, बिना ये सोचे हुए कि इसका अंजाम क्या हो सकता है! अगर कन्हैया के लकवाग्रस्त पिता की मौत सदमें से हो जाए तो क्या हम जिम्मेदार नहीं होंगे ? ‘The Indian Express’ ने अगर स्टोरी नहीं की होती तो इस देश को पता नहीं चलता कि वंचितों के हक में कन्हैया को बोलने की प्रेरणा कहां से मिलती है !

रामा नागा और दूसरों का हाल भी ऐसा ही है. बहुत मामूली पृष्ठभूमि और गरीबी से संघर्ष करते हुए ये लड़के जेएनयू में मिल रही सब्सिडी की वजह से पढ़ लिख पाते हैं. आगे बढ़ने का हौसला देख पाते हैं. लेकिन टीआरपी की बाज़ारू अभीप्सा और हमारे बिके हुए विवेक ने इनके करियर को लगभग तबाह ही कर दिया है.

हो सकता है कि हम इनकी राजनीति से असहमत हों या इनके विचार उग्र हों लेकिन ये देशद्रोही कैसे हो गए ? कोर्ट का काम हम कैसे कर सकते हैं ? क्या ये महज इत्तफाक है कि दिल्ली पुलिस ने अपनी FIR में ज़ी न्यूज का संदर्भ दिया है ? ऐसा कहा जाता है कि दिल्ली पुलिस से हमारी सांठगांठ है ? बताइए कि हम क्या जवाब दे लोगों को ?

आखिर जेएनयू से या जेएनयू के छात्रों से क्या दुश्मनी है हमारी ? मेरा मानना है कि आधुनिक जीवन मूल्यों, लोकतंत्र, विविधता और विरोधी विचारों के सह अस्तित्व का अगर कोई सबसे खूबसूरत बगीचा है देश में तो वो जेएनयू है लेकिन इसे गैरकानूनी और देशद्रोह का अड्डा बताया जा रहा है.

मैं ये जानना चाहता हूं कि जेएनयू गैर कानूनी है या बीजेपी का वो विधायक जो कोर्ट में घुसकर लेफ्ट कार्यकर्ता को पीट रहा था ? विधायक और उसके समर्थक सड़क पर गिरे हुए CPI के कार्यकर्ता अमीक जमेई को बूटों तले रौंद रहे थे लेकिन पास में खड़ी पुलिस तमाशा देख रही थी. स्क्रीन पर पिटाई की तस्वीरें चल रही थीं और हम लिख रहे थे – ओपी शर्मा पर पिटाई का आरोप. मैंने पूछा कि आरोप क्यों ? कहा गया ‘ऊपर’ से कहा गया है ? हमारा ‘ऊपर’ इतना नीचे कैसे हो सकता है ? मोदी तक तो फिर भी समझ में आता है लेकिन अब ओपी शर्मा जैसे बीजेपी के नेताओं और ABVP के कार्यकर्ताओं को भी स्टोरी लिखते समय अब हम बचाने लगे हैं.

घिन आने लगी है मुझे अपने अस्तित्व से. अपनी पत्रकरिता से और अपनी विवशता से. क्या मैंने इसलिए दूसरे सब कामों को छोड़कर पत्रकार बनने का फैसला बनने का फैसला किया था. शायद नहीं.

अब मेरे सामने दो ही रास्ते हैं या तो मैं पत्रकारिता छोड़ूं या फिर इन परिस्थितियों से खुद को अलग करूं. मैं दूसरा रास्ता चुन रहा हूं. मैंने कोई फैसला नहीं सुनाया है बस कुछ सवाल किए हैं जो मेरे पेशे से और मेरी पहचान से जुड़े हैं. छोटी ही सही लेकिन मेरी भी जवाबदेही है. दूसरों के लिए कम, खुद के लिए ज्यादा. मुझे पक्के तौर पर अहसास है कि अब दूसरी जगहों में भी नौकरी नहीं मिलेगी. मैं ये भी समझता हूं कि अगर मैं लगा रहूंगा तो दो साल के अंदर लाख के दायरे में पहुंच जाऊंगा. मेरी सैलरी अच्छी है लेकिन ये सुविधा बहुत सी दूसरी कुर्बानियां ले रही है, जो मैं नहीं देना चाहता. साधारण मध्यवर्गीय परिवार से आने की वजह से ये जानता हूं कि बिना तनख्वाह के दिक्कतें भी बहुत होंगी लेकिन फिर भी मैं अपनी आत्मा की आवाज (consciousness) को दबाना नहीं चाहता.

मैं एक बार फिर से कह रहा हूं कि मुझे किसी से कोई व्यक्तिगत शिकायत नहीं है. ये सांस्थानिक और संपादकीय नीति से जुडे हुए मामलों की बात है. उम्मीद है इसे इसी तरह समझा जाएगा.

यह कहना भी जरूरी समझता हूं कि अगर एक मीडिया हाउस को अपने दक्षिणपंथी रुझान और रुचि को जाहिर करने का, बखान करने का हक है तो एक व्यक्ति के तौर पर हम जैसे लोगों को भी अपनी पॉलिटिकल लाइन के बारे में बात करने का पूरा अधिकार है. पत्रकार के तौर पर तटस्थता का पालन करना मेरी पेशेवर जिम्मेदारी है लेकिन एक व्यक्ति के तौर पर और एक जागरूक नागरिक के तौर पर मेरा रास्ता उस लेफ्ट का है जो पार्टी द्फ्तर से ज्यादा हमारी ज़िंदगी में पाया जाता है. यही मेरी पहचान है.

और अंत में एक साल तक चलने वाली खींचतान के लिए शुक्रिया. इस खींचतान की वजह से ज़ी न्यूज़ मेरे कुछ अच्छे दोस्त बन सके.

सादर-सप्रेम,
विश्वदीपक